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क्या गीता कृष्ण का उपदेश है ?
श्रीमद् भगवदगीता को कृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश माना गया है। ब्रहमणी शास्त्रों के अनुसार जब कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पाण्डवों की सेनाऍ युद्ध के लिए आमने सामने खड़ी थीं। इन्द्र द्वारा कुन्ती से उत्पन्न पाण्डु पुत्र अर्जुन का रथ संचालन हेतु स्वयं कृष्ण सारथी थे। युद्ध क्षेत्र में जब रथ संचालन कर कृष्ण अर्जुन को लेकर आए तो अर्जुन ने युद्ध हेतु कौरवों की सेना जिसमें रिश्ते में उनके बन्धु बान्धव, सम्बन्धी थे को देखकर युद्ध करने से इन्कार कर दिया। तब अर्जुन के सखा और सारथी कृष्ण ने उन्हें समझाना शुरू किया। उनके समझाने से अर्जुन युद्ध को अंततः तैयार हो गए। कृष्ण ने कुरूक्षेत्र में अर्जुन को जो कुछ समझाया वही कृष्ण का उपदेश श्रीमद्भगवत गीता के नाम से जाना गया। यों तो गीता एक दार्शनिक ग्रन्थ है, जिसे साख्य दर्शन कहा जाता है। इसी गीता को लेकर कृष्ण को लोग कर्मयोगी मानते है। गीता में बिना परिणाम की अभिलाषा किए कर्म करने की प्रेरणा दी गयी है किन्तु इस ग्रन्थ में चातुर्वर्ण व्यवस्था, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, भाग्यवाद, स्वर्ग, नर्क, आत्मा- परमात्मा, आदि सभी ब्राहमणवादी विषमता के आधार बिन्दुओं का समर्थन किया गया है। जिन्हें कृष्ण-बचन नहीं स्वीकारा जा सकता। गीता में उल्लेख है--चातुवणर्यं मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः। तस्य कत्र्तारमापि माॅ विज्ञ कश्र्ररमव्ययम्। (गीता 4/13) अर्थात गुण कर्म के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा पैदा किए गए है। उनका कत्र्ता होते हुए भी मुझ अविनाशी केा अकत्र्ता समझो।‘
भला कृष्ण जो योगेश्वर है, दार्शनिक है, भेदभाव के विरोधी है, यज्ञों की बलि प्रथा के विरोधी है, वह वर्ण व्यवस्था के समर्थक कैसे हो सकते है ? वर्ण के नाम पर मानव जाति को चार भागों में बाँटने का भेदभाव कैसे कर सकते हैं ? वह भी तब जब गीता में ही स्त्री, वैश्य और शूद्र को पाप योनि कहा जा रहा हो। गीता के अध्याय-9 का श्लोक 32 देखें’ मॉ हि पार्थ व्यापश्रित्य ये अपि स्मः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेपि यान्ति परांगतिम्।। अर्थात ‘हे पार्थ स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र जो कि पाप योनि में उत्पन्न है, मेरी शरण में आने से उन्हें सद्गति प्राप्त होती है।’ अब यदि थोड़ी देर के लिए कृष्ण को योगेश्वर और महामानव न मानकर घेार पक्षपाती स्वीकार कर लें, तो भी वे वर्ण व्यवस्था के समर्थक कैसे हो सकते हैं? क्योंकि वर्ण निर्माण में मूल निवासी को ही वणिक और शूद्र कहा गया, चूँकि आर्यो ने भी अधिकांश औरतें सिन्धु वासियों में से ही ली थीं, इसलिए आर्य उन्हें पापयोनि कह सकते थे, किन्तु कृष्ण ऐसा कैसे कह सकते ? कृष्ण स्वयं ही मूलनिवासी यदुवंशी है, जिसे जाति के रूप में अहीर कहा गया। तब वे अपने ही जाति वर्ग को पापयोनि क्यों बताते ? ब्राहमणी ग्रन्थो में वेद से लेकर पुराण महाकाव्य रामचरित्र मानस आदि में सभी श्रमण संस्कृति मानने वालों से बना दी गयी जातियों के प्रति घृणा द्वेष व हीन भाव उत्पन्न किए जाने वाले उल्लेख है। व्यास स्मृति के अध्याय-1 के श्लोक 11 व 12 में बढ़ई,नाई,गोप (अहीर या यादव) कुम्हार, बनिया, किरात, कायस्थ, माली, कुर्मी, नटकंजर, भंगी, दास व कोल आदि सभी जातियाॅ इतनी नीच है कि इनसे बात करने के बाद सूर्य दर्शन या स्नान करने के बाद ही पवित्र होना कहा गया है। (वद्धिको, नाथितो, गोपः आशयः कुम्भकारकः। वणिक किरात कायस्थःमालाकार कुटुम्बिनः।। बेरटो भेद चाण्डालः दासः स्वपच कोलकः। एशां सम्भाशणम् स्नानं दर्शनाद वैवीक्षणम्।।) रामचरित्र मानस में पं0 तुलसी दास ने लिखा हैः- ‘आभीर यवन किरात खल स्वपचादि अति अघ रूप जे।’ वाल्मीकीय रामायण में भी राम व समुद्र की प्रतीक वार्ता में आभीर (अहीर) जाति के लोगों को भयानक पापी व दुष्ट कर्मा कहा गया है। यह उल्लेख युद्ध काण्ड के सर्ग 22 में श्लोक 33 पर आया है। इस तरह जब ब्राहमणी शास्त्र जिन लोगों को जाति- समुदाय के नाम पर अपमानित कर रहे हो तो उसी समाज का कोई महामानव अपने ही समाज को अपमानित करने और अन्य ब्राहमणी ग्रन्थों के ऐसे उल्लेखों का समर्थन करने वाली बात कैसे कह सकता है?
गीता में मूलनिवायों को अपमानित कर हीन भाव उपजाने वाले अथवा उनके दमन के श्लोकों की पूरी तरह भरमार है, जिसे स्वीकार कर लेने पर हम श्रमण संस्कृति में विश्वास करने वालों का पतन ही पतन है। इसलिए गीता कृष्ण के कहे वचनों या दिए गए उपदेशों का ग्रन्थ हो ही नहीं सकता। इसलिए भी यह कृष्ण वचन की पुस्तक नहीं हो सकती, क्योंकि महाभारत रामायण और गीता आदि ग्रन्थ बुद्ध के बाद लिखे गए है। जबकि कृष्ण बुद्ध से काफी पूर्व हुए।
कृष्ण के द्वारा अर्जुन को उपदेश युद्ध के मैदान में दिया गया दिखाया गया है। क्या कोई व्यक्ति युद्ध क्षेत्र में जब दोनों ओर की सेनाऍ आमने सामने लड़ने जा रही हों, उस समय इतना लम्बा उपदेश दे पाएगा ? क्या विपक्षी सेना कृष्ण का उपदेश सुनने के लिए चुपचाप हाथ बाँधे बैठी रहेगी? ऐसा कदापि सम्भव नहीं। वास्तव में तथागत ने अकारण प्राणी हिंसा से विरत रहने की बात कही और ब्राहमणी व्यवस्था का घोर अनुयायी तथागत के शीलों से प्रभावित होकर कलिंग युद्ध पश्चात अशोक युद्ध घोष के बजाय धम्म घोष की बात करके बुद्ध के विचारों का अनुयायी हो गया। युद्धप्रिय विभेदकारी नस्ली मानकिता वाले आर्यपुत्रों के लिए निश्चित रूपसे यह असह्य था। फलतः वृहद्रथ मौर्य की धोखे से पुश्यमित्रसुंग ने हत्या कर दी और उसके बाद रामायण, महाभारत, गीता जैसे ग्रंथों की रचना की गयी जो निरा काल्पनिक व चमत्कारी ग्रन्थ है। गीता में युद्ध के मैदान में युद्ध के लिए दी गयी प्रेरणा है।
तथागत बुद्ध ने कहा कि मुझसे पूर्व भी बहुत से बुद्ध हुए होंगे और मेरे बाद भी बहुत से होंगे। तथागत से पूर्व 27 बुद्धों की बात आयी है। स्पष्ट है बुद्धत्व प्राप्ति ज्ञान प्राप्ति की एक चरम कोटि है, जिसमें मानव मात्र या प्राणीमात्र के कल्याण का भाव ही मुख्य होता है। देशकाल परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग बुद्धों के वचनों में अनेक रूपता भी सम्भव है, किन्तु कुशल कर्म या कल्याण के भाव में अन्तर नहीं होगा क्योंकि वे प्रत्येक काल में तर्क व विवेक की कसौटी पर खरे उतरते हैं। कृष्ण का जो जन कल्याणकारी रूप है वह आर्य संस्कृति का पूर्ण विरोधी, पशुबलि व हिंसा विरोधी, प्राणीमात्र के कल्याण की भावना युक्त जनहितैषी व समतावादी है। कृष्ण जनमानस में बहुत ही रचे बसे थे किन्तु तब वे एक इतिहास बन चुके थे। इतिहास में मिलावट ज्यादा आसान थी। इसलिए तथागत बुद्ध की अपेक्षा गीता या महाभारत जैसे काल्पनिक ग्रन्थ के लिए ज्यादा उपयुक्त मान कर ब्राहमणवादियों ने कृष्ण का सहारा लिया और फिर पुराणों द्वारा तो कृष्ण को इस स्तर पर लाकर बैठा दिया, वह आज सबके सामने है। यद्यपि तथागत बुद्ध को भी विष्णु का अवतार बनाया अनेक चमत्कार जोडे़ परन्तु वे वैसा नहीं कर पाए जैसा चाहते थे। गीता में जो दार्शनिकता रखी गयी उसके सहारे आज ब्राहमणवादियों को समर्थन करने वाले दलित पिछड़ों के बीच से बहुत से लोग मिल जाते हैं, परन्तु क्या किसी सही बात के लिए तमाम गलत बातों को मान लेना आवयक है। जहर का एक बूँद मिला अच्छा भोजन भी अग्राह्य होता है और जब जहर ही ज्यादा हो तब तो उसे छूना भी खतरनाक है। निश्चित रूप से गीता कृष्ण वाणी नहीं है। उसे पढ़ने के लिए आँख से ज्यादा मस्तिष्क को खुला रखने की जरूरत है।
 
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