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हिन्दू धर्म के चार खूंटे
आपने अभी तक बैल और भैंस यानी जानवरों के खूटों के बारे में ही जानकारी रखी होगी। जानवरों के खूटों से यदि कोई मानव असावधानी के कारण टकराया होगा तो गिर गया होगा अथवा थोड़ा या ज्यादा घायल हुआ होगा। जानवर के खूटें से टकराकर किसी के मरने की बात तो कभी नहीं सुनी होगी। आज हिन्दू धर्म चार खूंटों में बंधा हुआ है, जिसमें पहला खुंटा है ब्राम्हण, दूसरा खुंटा है- हिन्दू धर्म के शास्त्र और देवता, तीसरा खुंटा है- हिन्दू धर्म के पर्व और त्योहार और चैथा खुंटा है- हिन्दू धर्म के तीर्थ स्थान। इन चारों खूंटों को ब्राम्हणों ने इतनी मजबूती से गाड़ा है कि बैल और गाय बना हिन्दू पुरूष और स्त्री इन्हीं से बंधा है। जब तक ये चारों खूंटे रहेगें तब तक हिन्दू पुरूष इस धर्म में बैल बना बंधा रहेगा और हिन्दू स्त्री गाय बनी बंधी रहेगी।
इस्लाम धर्म में जो भी योग्य और समर्पित मुसलमान हज कर लेगा वह हाजी हो जायेगा और जो कुरान कण्ठस्थ कर लेगा वह हाफिज हो जायेगा। ईसाई धर्म में कोई भी योग्य और समर्पित व्यक्ति पादरी हो सकता है। बौद्ध धम्म में कोई भी समर्पित स्त्री भिक्षुणी और समर्पित पुरूष भिक्षु बन सकता है मगर हिन्दू धर्म मंे तो पुरोहित वही होगा जो जाति से ब्राम्हण होगा। चरित्र से ब्राहम्ण चाहे कितना भी खराब हो, उसकी ब्राम्हण जाति ही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र है। ब्राम्हण हिन्दू धर्म का ऐसा मजबूत खूंटा है जो किसी के उखाड़े उखड़ने का नाम ही नहीं लेता।
हर हिन्दू परिवार में बिना ब्राम्हण के कोई मांगलिक काम हो ही नही सकता है, किसी का विवाह करना है तो दिन तारीख बतायेगा ब्राम्हण, किसी को नया घर बनाना हो भूमि पूजन करेगा ब्राम्हण, बिना ब्राम्हण पुरोहित से पूंछे हिन्दू हिलने की स्थिति में नही है। इतनी मानसिक गुलामी में जी रहे हिन्दू से विवेक की कोई बात करने पर वह सुनने को भी तैयार नहीं होता। हिन्दू समाज में ब्राम्हणों की इतनी अनिवार्यता और प्रमुखता दोनों आश्चर्यजनक है, पिछड़ों के आरक्षण का विरोध करते हैं ब्राहम्ण, पिछड़ों की शिक्षा, रोजगार सम्मान का विरोध करते रहे है ब्राम्हण। इतना विरोध करने के बावजूद ब्राम्हण पिछड़ों के इतने प्रिय और अनिवार्य क्यों बने हुए है ? ब्राहम्णवाद का दूसरा मजबूत खुंटा है- शास्त्र और देवता। शास्त्र का शाब्दिक अर्थ है जो नियम शस्त्र के भय से लागू किया गया उसी नियम की किताब को शास्त्र कहा जाता है। ब्राम्हणवादी शास्त्रों की तुलना जहरीले सापों से की जा सकती है, मगर जहरीले सांप हजारों की संख्या में भी उतने जानलेवा नही है जितने की ब्राहम्णवादी शास्त्र। इसीलिए पेरियार रामासामी नायकर ने तमिलनाडु में सन् 1926 को तथा डाॅ0 अम्बेडकर ने सन् 1927 में ब्राहम्णवाद की सबसे जहरीली पुस्तक ‘मनुस्मृति’ को महाराष्ट्र में हजारों लोगों के बीच जलाया था। ऋग्वेद और यजुर्वेद में कहा गया है ब्रम्हा के मुंह से ब्राहम्ण, भुजा से क्षत्री, जंघा से वैश्य और पैर से शूद्र पैदा हुए है। हिन्दू शास्त्र में स्त्री को गिरवी रखा जा सकता है, बेचा जा सकता है और उधार भी दिया जा सकता है। हिन्दू संस्कृति में विश्वास करने वाला व्यक्ति बिना पुजारी, पुरोहित के नहीं चल सकता उनके बिना अपने को अपाहिज मानता है क्योंकि पूजा-पाठ, विवाह आदि में मंत्र पुरोहित के द्वारा ही बोले जाते हैं, मंत्रों के लिए उन्होंने लिख रक्खा है:-
देवाधीनम् जगत सर्वम् मंत्राधीनम् देवता।
ते मंत्राः ब्राह्मणाधीनम् तस्मात ब्राह्मण देवता।।

अर्थात् सारा जगत देवताओं के अधीन है, देवता मंत्रों के अधीन है और मंत्र ब्राह्मणों के अधीन है, अतः ब्राह्मण ही असली देवता है। हिन्दू धर्म का तीसरा खुंटा है- हिन्दू धर्म के पर्व त्योहार। पर्व और त्योहार इन दोनों के भिन्न अर्थ है, पर्व का जन्म आर्यो द्वारा किये गये यज्ञ से हुआ और त्योहार का जन्म आर्यो द्वारा इस देश के दलितों, पिछड़ों (मूल वासियों) की, की गई निर्मम हत्या पर आर्यो द्वारा मनाये गये जश्न से हुआ। आर्यो ने जब भी और जहां भी विजय हासिल की उसकी खुशी में यज्ञ किया, यही पर्व कहा गया। पर्व ब्राम्हणों की विजय और त्योहार भारत के मूल निवासियों की हार की पहचान है, त्योहार का मतलब ही होता है ”तुम्हारी हार“। इस देश के मूलवासी अनभिज्ञता के कारण पर्व त्योहार मना रहे हैं जो सब के सब ब्राहम्णवाद के जबरदस्त खूंटे से बंधे हैं न किसी को इतिहास का ज्ञान है न ही अपमान बोध है। ब्राहम्णवादी पर्व त्योहार मनाकर इस देश के मूल वासियों ने अपना मान-सम्मान, इतिहास सब कुछ खो दिया है, हिन्दू समाज द्वारा मनाये गये सभी पर्व त्योहार आर्यों की विजय और इस देश के मूल वासियों की, की गई हत्या पर आधारित है, अपने ही अपमान और विनाश पर हम उत्सव मना रहे है और शत्रुओं को सम्मान और धन दे रहे हैं क्या यह चिन्तन का विषय नहीं है ? जो हमारा अपमान है उसे ही हमारे लिए पर्व और त्योहार बनाकर हमारे जीवन में ऐसा घालमेल पैदा कर दिया गया है कि अब सच्चाई कहते और बतलाते सदियों लग जायेगें। खूंटा का काम है किसी को अपने समीप बांधे रखना पर्व-त्योहार भी अपने अनुयायियों को अपने समीप बांधे रहता है। त्योहार तो सभी धर्मो में है मगर अन्य धर्मो के त्योहार और हिन्दू धर्म के त्योहार में जमीन आसमान का अन्तर है। बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म में किसी देवी-देवता को शराब, गांजा, भांग आदि चढ़ाना न धर्म है न पुण्य। मगर हिन्दू धर्म में शंकर को गांजा भांग और दुर्गा को शराब चढ़ाना धर्म भी है और पुण्य भी है। होली तो हत्या और बलात्कार का त्योहार बन कर रह गया है जिसकी जानकारी भी हमारे लोगों को नही है किसी बौद्ध त्योहार, ईसाई त्योहार या मुस्लिम त्योहार में न हत्या होती है न बलात्कार की घटना होती है, किसी धर्म के त्योहार में जुअंा खेलना न धर्म है न पुण्य, किन्तु हिन्दू धर्म के दीपावली में जुआं खेलना धर्म और पुण्य दोनों माना गया है। ब्राम्हणवाद का चैथा खुंटा है- उसके तीर्थ स्थान, ब्राम्हणों ने देश के चारो ओर तीर्थ स्थान के नाम पर हजारों खूंटे गाड दिया है। पूरे देश में ब्राहम्णवाद के खूंटे ही खूंटे है। इन तीर्थों के खूंटों से टकराकर मरना पुण्य का काम माना गया है। जुलाई 2014 में केदारनाथ की यात्रा के क्रम में हिमालय पर्वत पर भारी वर्षा होने और अलखनन्दा नदी में भारी उफान आने के कारण केदारनाथ मन्दिर के पास का पूरा नगर व बाजार भारी बाढ़ व तूफान में बह गया जिसमें लगभग दस हजार लोग मर गये। पूरे भारत में इस तरह के ब्राहम्णवादी खूंटों से टकराकर मरने वालों की घटनाएं तो आप प्रतिदिन अखबारों में पढ़ते ही रहते होगें।
विचार-विमर्श करना होगा, चिन्तन-मनन करना होगा। किसी भी मांगलिक कार्य में ब्राहम्ण पुरोहित को मत बुलाओ, तो समझो तुम्हारे स्तर से एक खुंटा उखड़ गया। शास्त्रों और देवी-देवताओं (गीता, रामायण, महाभारत आदि) को न पूजो न पढ़ो और न अपने घर में रखो, समझो तुम्हारे स्तर से दूसरा खूंटा उखड़ गया। हिन्दू त्योहारों को अपने घर में होना बन्द कर दो, समझो तुम्हारे स्तर से तीसरा खूंटा उखड़ गया और यदि तीर्थों में जाना बन्द कर दोगे तो समझो चैथा खूंटा भी उखड़ गया। ब्राहम्णवाद का घर में लेशमात्र भी प्रवेश न हो, हर किसी को अपने अपने घर से बाम्हणवाद को उखाड़ फेकना है। आज किसी ब्राहम्ण पुरोहित का दबाव किसी पिछड़े, दलित (मूलवासी) पर नही है, इसलिए आज ब्राम्हण को दोष देना बेकार है वे दोषी कभी थे मगर आज नही। यदि कोई बनिया बहुत घटिया सामान को बहुत महंगा दाम में बेचे और इस सच्चाई को जानते हुए भी कोई ग्राहक उसी घटिया बनिया से घटिया सामान खरीदता है तो दोष किसका माना जायेगा ? घटिया बनिया का या घटिया ग्राहक का ? आप जानते हुए भी यदि घटिया ब्राहम्ण पुरोहित से घटिया धर्म का घटिया सौदा लेकर अपने को मानसिक गुलाम साबित करते हैं तो इसमें दोष किसका है ? क्या पाठकों को इस पर चिन्तन- मनन करने की आवश्यकता नहीं है ?
 
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