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क्या प्रहलाद और होलिका आग में बैठे ?
भागवत पुराण में एक कथा है आर्य कबीले के दक्ष और उनके दामाद शिव में शत्रुता चल रही थी। दक्ष ने एक यज्ञ किया किन्तु उसमें शिव को नहीं बुलाया, फिर भी दक्ष की पुत्री सती ने यज्ञ में जाने की जिद की। शिव ने अपना अपमान करने की योजना सती को याद दिलाई और यज्ञ में जाने से मना किया परन्तु सती अपने सम्बन्धियों से मिलने को आतुर थी इसलिए शिव की बातों की अवहेलना कर पिताके यज्ञ में सम्मिलित होने को चली गई। वहाँ उन्होंने अपने पिता से अपने पति को न बुलाए जाने की भत्र्सना की, सती ने पिता को धमकी दी कि माता-पिता से उन्हें जो देह प्राप्त हुई है उसे वह अग्नि को समर्पित कर देगी। सती ने देखा कि मेरी बातों का पिता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है तो वह यज्ञ की अग्नि में कूद पड़ी और भस्म हो गयी। शिव के गण जो सती के साथ गये थे उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।
इस कथा से स्पष्ट है कि साक्षात शंकर (भगवान) की पत्नी सती भी आग में कूदने पर जलने से बच न सकी, जलकर भस्म हो गई। तब ईश्वर भक्त प्रहलाद आग में बैठने से कैसे बच सकता था? प्रहलाद को आग में बिठाया ही नही गया था अन्यथा वह भी सती की तरह भस्म हो जाता हाँ होलिका आग में अवश्य जल गयी थी जिसे अनार्यो के शत्रु आर्यो द्वारा उसे जलाया गया था। बाल्मीकी रामायण का एक श्लोक है-
असुरास्तने दैतैयाः सुरास्ते नादितेः सुतः।
हृष्ट प्रमुदिताश्चा सन् वारूणी ग्रहणात्सुरः।।

अर्थ- वे लोग असुर है जो सुरापान नही करते, देवगण वारूणी सुरा का पान करके हर्षित, प्रमुदित और हृष्ट-पुष्ट होते है।
यहाँ सुरा (शराब) न पीने वालों को ही असुर कहा गया है।
चार वर्ण का प्रचार-प्रसार करने वाली मंडली का नाम आर्य था, आर्य विचारधारा को न मानने वाला समुदाय अनार्य और असुर कहा जाता था पाठक समझ गये होगे कि अनार्य, असुर, राक्षस, दैत्य,और शूद्र इस देश के पिछड़े, दलित और आदिवासी ही थे और आज भी है। इसी प्रकार हिरणाकश्यप भी इस देश का मूल निवासी राजा था। यदि हिरणाकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद को मारना चाहते थे तो उसे होलिका के साथ बिठाने की क्या आवश्यकता थी, उसे अकेले भी जलाया जा सकता था, प्रहलाद इतना तगड़ा पहलवान न था कि राजा की पकड़ से छूटकर भाग जाता। उसे आग से जला कर मारना क्या जरूरी था, मारने के अनेको और भी तरीके थे, उसे हथियार द्वारा मारा जा सकता था अथवा तलवार से उसका सीना या पेट चीरा या गर्दन काटी जा सकती थीं प्रहलाद यदि होलिका के साथ आग में बैठा होता तो जब होलिका जल गई थी तो वह भी जल जाता। जो व्यक्ति ईश्वर के भक्त हो और इस घटना को सही मानते हो उन्हें भी अग्नि में बैठा दो यदि वे बच गये तो यह मान लिया जायगा कि प्रहलाद भी बच गया होगा।
एक आम की लकड़ी और नीम की लकड़ी दोनों लकड़ी है उन्हें आग में डालों दोनों ही जल जाती है तब यह कैसे हो सकता है कि पांच तत्वों से रचे प्राणी होलिका और प्रहलाद आग में बैठे और उन दो में से एक जल गया और एक बच गया, हो ही नहीं सकता बिल्कुल झूठ है। आग का स्वभाव जलाना है इसी कारण उसका नाम आग है, आग में तो लोहा तक ताप की एक सीमा में जाकर द्रव में परिवर्तित हो जाता फिर पांच तत्व से बनी इस देह की विशात ही क्या है? अतः यह अकाट्य सत्य है कि आग में बैठा प्रहलाद बच ही नहीं सकता था। नीम और करेला का स्वाभाविक गुण कडवाहट है उन्हें खाओंगे तो मुख कड़वा ही होगा, चाहे उसमें चीनी अथवा मिश्री मिलाओं तब भी वह मूल रूप से कडुवा ही रहेंगे, करेला की सब्जी नमक डालकर तेल में पकाने के बाद भी कडुवा पन नहीं त्यागती, क्योंकि नीम और करेला कडु़वें ही होते है। तब आग में रखी गयी वस्तु अथवा प्राणी को आग कैसे नही जलाएगी। अतः यह सिद्ध होता कि प्रहलाद आग में बैठा ही नहीं, नहीं तो वह जल ही जाता।
घर से निकाला गया प्रहलाद शराबी, जुआरी और व्यभिचारी आर्यो के पास बैठने लगा, इन सबके सम्पर्क में रहने के कारण प्रहलाद दुव्र्यसनों में पड़कर पूरी तरह आवारा और नशाखोर बन चुका था। जैसा कि अकसर देखा जाता है कि भतीजे के प्रति बुआ का स्नेह कुछ ज्यादा ही होता है। अतः घर से लिकाल दिये जाने के बाद भी प्रहलाद की बुआ होलिका का स्नेह उसके प्रति बना ही रहा। इसी स्नेह से वह रोज शाम को राजा से छिपा कर उसे भोजन देने जाया करती थी।
चूंकि पहले से ही होलिका का विवाह तय हो चुका था और पूर्णिमा के दूसरे दिन ही होलिका की बारात आनी थी। एक तो वह राज कन्या थी दूसरे सोलह बहारो के समेटे यौवन की सुन्दरता में चार चांद लगा रहे थे। शायद वह प्रहलाद को आखिरी बार मिलने गई थी क्योंकि अगले दिन ही उसे उसकी ससुराल जाना निश्चित किया जा चुका था। होलिका जब अपने भतीजे के पास पहुँची तो उन शराबी आर्यों की नियत युवा सुन्दरी होलिका को देखकर अवश्य खराब हुई होगी।
शराबी आर्यों ने राजा से दुश्मनी निकालने के लिए निहत्थी होलिका के साथ क्या नहीं किया होगा? प्रहलाद तो इतने नशे में था कि वह स्वयं को ही नही सम्भाल पा रहा था। शराबी आर्यों द्वारा किये गये कुकृत्यों से होलिका की हत्या हो गयी शराबियों को जब होश आया होगा तब भेद खुल जाने के डर से सबूत मिटाने के लिए सभी ने रातो रात होलिका की लाश को जला देने का भी निर्णय ले लिया। इसके लिए रात में जहाँ से जिस रूप में लकड़ी मिली जैसे किसी की खाट, किसी का छप्पर, बांस, फूस किसी का तख्त, किसी के उपले, किसी का ईधन जिसे जो भी मिला उसे लाकर लाश पर डालते चले गये होगें और अंत मे आग लगा दी। इस समय जंगलो में रहने वाले लोग जानवरों से सुरक्षा और ठंड से बचाव के लिए रात को आग जलाते ही थे इस लिए होलिका को जलाने में सफल हो गये और किसी को इस बात का पता भी न लगा। होली की लकड़ी, एकत्र करने के लिए आज भी इसी तर्ज पर प्रक्रिया अपनाई जाती है।
रात्रि होने के समय जब महल में होलिका नहीं दिखाई दी तभी राजा ने उसे ढूढ़ने के लिए खुफिया दल को भेजकर शराबी आर्यों की मंडली व प्रहलाद को गिरफ्तार करवा लिया गया। न्यायप्रिय राजा हिरण्यकश्यप अपराध में अपने पुत्र के शामिल होने के कारण स्वयं निणर्य न लेकर मामला न्यायपालिका को सौंप दिया। न्यायपालिका ने निर्णय लिया कि इतने लोगों ने मिलकर एक लड़की की न केवल हत्या की बल्कि उसकी आबरू को भी नहीं बक्शा होगा यह असुरों की सामाजिक मर्यादा का सबसे बड़ा अपमान है। इन लोगों ने मिलकर एक बहादुर नारी को मार डाला इससे बड़ी कायरता और क्या होगी?
इसके बदले में इनके जीवन भर के सम्मान को
धराशायी कर देना चाहिए, इनको इस प्रकार अपमानित किया जाय कि ये जीवन भर इसका अहसास करते रहें। आज के बाद ये लोग अपने को वीर पुरूष समझने और किसी अन्य नारी को मारने की भूल न कर सकें। इस अवीरतापूर्ण कुकर्म की ऐसी सजा दी जाए जिसे ये जीवन भर न तो मिटा सकें और न छिपा सकें। सभा में उन अपराधियों के माथे पर तलवार की नोक से अवीर शब्द लिखना निश्चित किया गया और सबके सामने दरबार में तलवार की नोक से उनके माथे की त्वचा को चीरते हुए ‘अवीर’ (अ-वीर) शब्द लिखा गया इतना ही नहीं उन्हें जूतो चप्पलों की माला पहनाकर गधे पर बिठाकर पूरे नगर में उनका जुलूस निकाला गया। अपराधियों के ऊपर कोई गोबर फेकता, कोई कीचड़ फेकता, कोई गन्दा पानी और कालिख फेंक कर उन्हें जलील करता। भारत के इतिहास में यह पहली घटना थी जब कन्याओं पर बुरी नजर डालने वालो को अवीर (कायर) अ-वीर का टीका लगाकर और मुंह पर कालिख पोत कर अपमानित किया गया।
तलवार की नोंक से माथे पर कुरेद कर ‘‘अ-वीर’’ शब्द लिखा जाना कोई मामूली सजा नही थी कितने ही अपराधी लिखते समय बेहोश हो जाते थे, पीड़ा को सहन न करने वाले कुछ वहीं मर जाते थे कुछ तो उचित उपचार न होने से, कुछ घाव पकजाने से मर जाते थे इसके बाद भी जो ठीक हो जाते उनको समाज में रहना मुश्किल था वे किसी के सामने अपना मुंह दिखाने लायक नही रह जाते थे। अपमान को सहन न कर सकने के कारण कुछ स्वयं आत्म हत्या कर लेते थे। समय के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबन्ध, परम्पराएं दिन प्रतिदनि कमजोर पड़ती गई आज तलवार से लकीर न बनाकर सिर्फ खून जैसा रंग ही लगाना शुरू कर दिया उस खून और खून जैसे रंग का नाम अवीर हो गया। होली केे अगले दिन माथे पर आज भी अवीर (गुलाल) लगाया जाता है जो कायरता का प्रतीक है और हम सब कायरता के प्रतीक को सहर्ष माथे पर लगाते और लगवाते है आपस में एक दूसरे के चेहरे पर रगड़ते और उड़ाते है जैसे उस समय प्रजाजनों ने अपराधिायों का मुँह काला करने हेतु लगाया था। अतः पिछड़े दलितों को होली का उत्सव न मनाकर होलिका
 
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