Yadav Shakti Magzine
महिषासुर यादव वंश के राजा थे
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी दिल्ली में वर्ष 2011 से महिषासुर परिनिर्वाण दिवस मनाने का क्रम जारी होने से देशभर में एक बहस की शुरूआत हुई है। वैसे तो अप्रैल से जून 2011 के अंक में यादव शक्ति पत्रिका ने श्री एन॰ यादव लखनऊ द्वारा लिखे यदुवंश शिरोमणि महिषासुर नामक लेख का प्रकाशन कर महिषासुर के संदर्भ में एकपक्षीय बहस पर विराम लगाने की कोशिश शुरू कर दी थी लेकिन जे॰ एन॰ यू॰ में श्री जितेन्द्र यादव द्वारा गोष्ठी की शुरूवात करने के बाद महिषासुर के पक्षधर लोग भी राजधानी दिल्ली में खुलकर सामने आ गये हैं।
मैं यादव होने के नाते निःसंकोच कह सकता हूँ कि उत्तर भारत और खास तौर पर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में विकराल रूप धारण कर रहे दुर्गापूजा समारोह में सर्वाधिक सहभागिता यादवों की है। महिषासुर मर्दिनी की जय बोलने वाले ज्यादातर लोग यादव बिरादरी के ही है। इनके बाद अन्य और दलित भी पूरे दम खम से महिषासुर विनाशनी दुर्गा के प्रचंड भक्त हैं। ये पिछड़े, दलित नौ दिन नवरात्र व्रत से लेकर हवन, पूजन बलि दुर्गा मूर्ति स्थापना आदि में लाखों-लाख वारा-न्यारा कर रहें हैं। ये कमेरे वर्ग के लोग दुर्गा को शक्तिशाली मानकर नवरात्र में पूरे मनोयोग से पूजा कर रहें हैं और ये उम्मीद लगाते हैं कि महान बलशाली महिषासुर को मारने वाली दुर्गा प्रसन्न होकर इन्हें प्रतापी बना देगी। इसी उम्मीद में देश का सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा तबका अपना पेट काटकर शक्ति की प्रतीक दुर्गा की आराधना में लगा हुआ हैं। वह इस पर विचार नहीं करता है कि सुर-असुर संग्राम अर्थात आर्य-अनार्य संग्राम में आर्य संस्कृति (ब्राह्मणवाद) के घोर विरोधी महिषासुर का वध करने वाली दुर्गा ने प्रकारान्त से हम पिछड़ो को अपना सामाजिक एवं सांस्कृतिक गुलाम बनाने के लिए हमारे पूर्वज महिषासुर की हत्या छल पूर्वक किया था। हजारों वर्ष पूर्व आर्य संस्कृति की राह में बाधक बने महिषासुर की छल पूर्वक हत्या करने वाली दुर्गा की पूजा अभिजात्य वर्ग के लोग हमसे क्यों करा रहें हैं? क्या देवी दुर्गा वास्तव में शक्ति की देवी है, महाप्रतापी है, दुश्मनों का नाश करने वाली है? यदि है तो गोरी, गजनी, बाबर, डलहौजी, विक्टोरिया का वध इस देवी दुर्गा ने क्यों नहीं किया? क्यों एक भैंसवार, काले-कलूटे, पहलवान, उभरे मांसपेशियों एवं खड़ी मूछों वाले बहादुर महिषासुर का ही वध (हत्या) किया गया।
महिषासुर को यादव कहने पर सबसे अधिक नाराजगी यादवों को होगी, ऐसा मै समझता हूँ लेकिन सत्य तो सत्य ही रहेगा। हम सत्य को कब तक झुठला सकेंगे। महिषासुर का समास विग्रह महिअसुर होगा। महिष का अर्थ है भैंस और असुर का अर्थ इस देश के उस मूल निवासी से है जो हिंसा का विरोधी एवं प्रकृति का पूजनहार है।
हिन्दुस्तान अखबार के 6 जनवरी 2011 के अंक में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस श्री मारकन्डेय काटजू एवं श्री ज्ञान सुधा मिश्रा ने अपने एक निर्णय में कहा है कि ”राक्षस और असुर कहे जाने वाले लोग ही इस देश के असली नागरिक हैं।“ सुरा अर्थात शराब का सेवनहार ‘सुर’ एवं सुरा अर्थात शराब के सेवन का विरोधी ‘असुर’ के रूप में समझा जा सकता है। ऋग्वेद सुरापान (सोमरस) के श्लोंकों से भरा पड़ा है। ऋग्वेद, वाल्मिीकि रामायण सहित हिन्दू धर्मशास्त्र नरमेघ यज्ञ, गोमेघ यज्ञ, अश्वमेघ यज्ञ आदि के महिमा से महिमामंडित है।
असुर या राक्षस का नाम आते ही हमारे सामने एक भयानक रूप दिखने लगता है जो अभिजात्यवर्गीय-ब्राह्मणवादी साहित्य में हमें पढ़ने को मिलता है। सम्पूर्ण ब्राह्मणवादी साहित्य असुरों के विरोध एवं वध (हत्या) से भरा पड़ा है। इस साहित्य में यह कहीं जिक्र नहीं हैं कि असुरों ने मानवता के विरूद्ध कौन सा अपराध किया। असुर नायकों एवं उनकी सेना के वध का एक मात्र कारण इनके यज्ञों का विरोध एवं विष्णु, इन्द्र आदि के सत्ता को चुनौती है। ब्राह्मणवादी ग्रन्थों के मुताबिक यज्ञ विरोधी असुर कहलाये महिषासुर के पिता रम्भासुर असुरों के राजा थे तथा माता श्यामला राजकुमारी थी। इस देश के मूल निवासी जिन्हें आर्यो ने साढे़ं तीन हजार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी की सभ्यता को नष्ट कर हजारों वर्ष चले युद्ध में छल-कपट से परास्त कर असुर अछूत, शूद्र आदि बनाके सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर एवं गुलाम बना लिया और इनके राजाओं एवं नायकों की हत्या कर असुर और राक्षस घोषित कर पुराण कथा में गढ़ डाला। मध्य एशिया, ईरान से आये आर्य भारत में यहाँ के मूल निवासियों के सत्ता और संस्कृति पर कब्जा के लिए लम्बें समय तक युद्ध किये और अनेकानेक पतित हथकंडों को अपना के इस देश के निश्छल ईमानदार, कमेरे, हिंसा विरोधी, प्रकृतिप्रेमी, मूलनिवासियों (असुरों) को मारकर अपनी ब्राह्मणवादी हिंसक संस्कृति का बीजारोपड़ कर डाले।
मैने महिषासुर को यादव कहा है मेरे ऐसा कहने पर प्रतिवाद होगा जो लाजमी है। लोग प्रमाण मांगेंगे और कहेंगे कि हम महिषासुर को यादव कैसे मान लें? इस देश के सम्पूर्ण शूद्र, पिछड़ों, अन्त्यजनों कमेरों, अर्जकों, या शोषितों का कोई इतिहास नहीं है। इन पच्चासी प्रतिशत के पिछली चार पीढि़यों को यदि हम छोड़ दे तो शायद ही कोई व्यक्ति मिलेगा जो दावे के साथ कह सकेगा कि उसकी पिछली पांचवी पीढ़ी पढ़ी-लिखी थी। हम पिछड़ों को हजारों वर्ष से प्रचलित कथाओं, किम्बदन्तियों, लक्षणों एवं खुद से मिलते-जुलते नायकों के रूप रंग कार्यआदि को जोड़कर ही अपना इतिहास रचना है और मै इसी आधार पर महिषासुर को यादवों के करीब पाता हूँ। यादव का आशय दूध वाला, ग्वाला, भैंसपालक, पशुपालक है। यादव का मतलब पहलवान, गठीला रोबीला बहादुर, नतमस्तक न होने वाला लड़ाकू सांवले व काले कद काठी का मूँछ रखने वाले रौबदार व्यक्ति से लगाया जाता है। मैं जब महिषासुर और यादवों के इन समानताओं में मेल देखता हॅँू तो मुझे यह आभास होता है कि निश्चय ही महिषासुर यादवों का बहादुर पूर्वज रहा होगा। इसी यादवी समानता के गुणों के आधार पर मै इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि असंख्य भैंसों को पालने के नाते इस बहादुर यादव राजा का नाम महिषासुर पड़ा होगा। महिषासुर को दुर्गा के हाँथों क्यों मरवाया गया? जब हम इस प्रश्न पर विचार करंेगे तो ब्राह्मणी ग्रन्थों के मुताबिक अहिल्या का सतित्व भंग करने वाला, सोमरस पीने एवं मधुपर्क खाने वाला, मेनका-उर्वशी नर्तकियों के नृत्यादि का भोग करने वाला आर्य संस्कृति पोषक इन्द्र जब महिषासुर से परास्त हों गया तो आर्य संस्कृति के संरक्षक सुरों ने सुन्दरी दुर्गा को भेजकर महिषासुर की हत्या करा दिया। सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी समझ सकता है कि जिस महिषासुर से इन्द्र एवं इन्द्र की विशाल सेना लड़ पाने में नाकाम रही उसे केवल और केवल एक स्त्री दुर्गा कैसे परास्त कर मार ड़ालेगी?
मैने महिषासुर के कृतित्व एवं व्यक्ति में समानता के आधार पर उसे यादव बताया है वहीं महान इतिहासकार डी0 डी0 कौशाम्बी ने अपने पुस्तक ”प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता“ के प्रष्ठ 58 पर लिखा है कि ”जिन पशुपालक लोगों (गवलियों) ने इन वर्तमान देवों को स्थापित किया है, वे इन पुराने महापाषाणों के निर्माता नहीं थे, उन्होंने चट्टानों पर खांचे बनाकर महापाषाणों के अवशेषों का अपने पूजा स्थलों के लिए स्तूपनुमा शवाधानों के लिए सिर्फ पुनः उपयोग ही किया है। उनका पुरूष देवता म्हसोबा या इसी कोटि का कोई देवता बन गया, आरम्भ में पत्नी रहित था और कुछ समय के लिए खाद्य संकलनकर्ताओं की अधिक प्राचीन मातृदेवी से उसका संघर्ष भी चला। परन्तु जल्दी ही इन दोनों मानव समूहों का एकी करण हुआ और फलस्वरूप इनके देवी देवता का भी विवाह हो गया। कभी-कभी किसी ग्रामीण देव स्थल में महिषासुर-म्हसोबा को कुचलने वाली देवी का दृश्य दिखाई देता है तो 400 मीटर की दूरी पर वही देवी, थोड़ा भिन्न नाम धारण करके, उसी म्हसोबा की पत्नी के रूप में दिखाई देती है। यही देवी ब्राह्मण धर्म में शिव पत्नी पार्वती के रूप में प्रकट हुई, जो महिषासुर मर्दिनी है। कभी-कभी यह पुराने रूप में लौटकर शिव का भी मर्दन करती है। इस सन्दर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सिन्धु सभ्यता की एक मुहर पर त्रिमुख वाले जिस आदि रूप शिव की आकृति उकेरी हुई है, उसके सिर के टोप पर भी भैंस के सींग हैं।” उक्त उद्धरण में गवलियों का नाम आया है। गवली और यादव एक ही हैं। इस प्रकार इतिहासकार डी॰ डी॰ कौशम्बी ने महिषासुर या म्हसोबा को गवली या यादव माना है।
मैने आर्य और अनार्य की चर्चा की है। एक गोष्ठी में एक सजातीय पूर्व प्रधानाचार्य ने अपने सम्बोधन में मेरे पाखण्ड विरोधी तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि मै आर्यों के भारतीय न होने के तर्क से सहमत नहीं हूँ। भारत में हुई समस्त देव-दानव, देवासुर संग्राम, राम-रावण, वामन-बलि हिरणाकश्यप, नरसिंह, महिषासुर-दुर्गा या इन्द्र कृष्ण युद्ध आर्य एवं अनार्य युद्ध ही हैं। आर्यजन ही इतिहास लिखे हैं। क्योंकि अनार्य शिक्षा से वंचित कर दिये गये थे देश की पच्चासी प्रतिशत कमेरी अनार्य जनता मुगलों, अंग्रजों आदि के आने के बाद ही शिक्षा का अधिकार पा सकी है। इसलिए महाभारत में गीता और कृष्ण को आर्य एवं चार वर्णों का रचनाकार बताया गया है तो वहीं ऋग्वेद में कृष्ण को (अनार्य) असुर बताते हुए इन्द्र के हाँथों मरवाया गया है। एक ही लेखक वेदव्यास महाभारत में इन्द्र को कृष्ण के हाथों पराजित करता है और वही लेखक वेदव्यास ऋग्वेद में कृष्ण को असुर बताते हुए इन्द्र द्वारा चमड़ा छीलकर कृष्ण को मारने की बात लिखता है।
आर्यांे के सम्बन्ध में प्रख्यात इतिहासकार भगवतशरण उपाध्याय ने अपनी पुस्तक ”खून की छीटे इतिहास के पन्नों पर” में ब्राह्मण नामक अध्याय में लिखा है कि ऋग्वैदिक परम्परा में मै भारतीय नहीं हूँ जिस देश से प्राचीन ऋग्वैदिक आर्य भारत में आये थे मै भी वहीं से आया था, क्यों कि मै ही उनका नेता उनका मंत्रदाता था। भारत में मैं (ब्राह्मण) भी अपनी शत्किम हिंस्त्र टोलिया लिये आया। मै चला तो भूख से आहार की तलाश में था परन्तु मेरा नारा था- ”कृण्वंन्तं विश्वमार्यम्।“ इसी तरह महानतम सहित्यकार आर्य चतुरसेन ने अपनी पुस्तक ”वयं रक्षामः“ के अन्तिम पृष्ठ पर लिखा है कि ”रावण का यह निधन ऐसा था जिसने सम्पूर्ण अनार्य बल तोड़ दिया था।“ आचार्य चतुरसेन ने रावण को सप्तद्वीप पति बताते हुए लिखा है कि बदली भौगोलिक परिस्थितियों में आस्ट्रेलिया, जावा, सुमात्रा, मेडागास्कर, अफ्रीका आदि नाम से प्रसिद्ध देश उसके राज्य के हिस्सा थे। उन्होने लिखा है कि अनार्य राजा रावण की मृत्यु के बाद इस प्रकार आज के सब देशों में आर्य नेता-विजेता मर्यादापुरूषोत्तम राम का किसी न किसी रूप में सांस्कृतिक मिश्रण है।
आर्यो के सन्दर्भ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ”डिस्कवरी आफ इंडिया“ में स्पष्ट लिखा है कि ”भारतीय आर्य और ईरानी अलग होकर अपना-अपना रास्ता लेने से पहले एक ही नस्ल के थे। जाति की दृष्टि से तो दोनों एक थे ही परन्तु उनके पुराने धर्म और भाषा में भी समानता है। वैदिक और जरथ्रुस्त धर्म में बहुत सी बाते एक सी हैं और वेद तथा अवेशता दोनों एक दूसरे से मिलती जुलती है।“ इस तरह से गैर भारतीय इतिहासकारों के अलावा इन भारतीय इतिहासकारों ने भी आर्यो को विदेशी स्वीकार किया है जिन्होंने आक्रमण करके यहां के मूल निवासियों पर वैदिक संस्कृति थोपकर अपनी राजसत्ता कायम की है।
मै फिर मूल बिन्दु महिषासुर पर इन कुछ प्रमाणों के बाद आता हूँ। महिषासुर के समस्त लक्षण यादवों से मिलते हैं। हमें या इस देश के मूल निवासियों को अपना इतिहास गोताखोर बनके ढूढ़ना और तलाशना है। यह तलाश लम्बे समय तक चलेगा तब जाकर हमें वैदिक आर्य या ब्राह्मणवादी इतिहास से इतर अपना इतिहास ज्ञात हो सकेगा। अनार्य महापुरूष महिषासुर ने जब इन्द्र को परास्त किया तो आर्य खेमे में मायूसी हो गयी। यह मायूसी कैसी थी ? यह मायूसी यज्ञ न कर पाने की थी। यज्ञ में क्या होता था?यज्ञ में लाखों गायों, बैलों, भैंसों, घोड़ों, भेड़ों, बकरों को काटकर आर्य लोग चावल मिश्रित मांस पकाके मधुपर्क के रूप में खाते थे। सोमरस एवं मैरेय (उच्च कोटि की शराब) पीते थे। जौ, तिल, घी, आग में जलाते थे अनार्य पशुपालक एवं कृषक थे जबकि आर्य मुफ्तखोर थे जो अनार्यो से यह सब कुछ छीनने के लिए युद्ध करते थे। अनार्यो एवं आर्यो के बीच होने वाले इस युद्ध में अनार्यों को यज्ञ विरोधी घोषित कर राक्षस परिभाषित किया जाता था। आर्य सुरा सुन्दरी के सेवन हार थे। अप्सराएं रखना इनका शौक था। समस्त हिन्दू धर्मग्रन्थ जारकर्म को पुण्यकार्य घोषित करते हैं। सन्तान पैदा करने के लिए जारकर्म को नियोग विधि का जामा पहनाया गया। आर्य राजा परस्त्रीगमन को धर्म संगत बताकर वृन्दा, अहिल्या, मच्छोदरी, कुन्ती सहित अन्यान्य स्त्रियो से बलात्कार एवं सम्भोग किये हैं। आर्य उपरोक्त कार्यो को वैदिक सनातन धर्म का आवश्यक अंग बताये तो अनार्यो ने इसके विरूद्ध महिषासुर, बलि, रावण, हिरण्यकश्यप, आदि के रूप में युद्ध किया जिन्हें इन आर्यों ने सीधी लड़ाई में परास्त करने के बजाय धोखे एवं छल से मारा जो इन्होंने खुद द्वारा लिखी किताबो में स्वीकार किया है।
महिषासुर से बरसों लड़ने के बाद जब आर्य राजा इन्द्र परास्त कर पाने के बजाय परास्त होकर भाग खड़ा हुआ तो आर्यो ने छल बल का सहारा लिया और आर्य कन्या दुर्गा को महिषासुर के पास भेजकर महिषासुर का दिल जीतकर उसे मारने की रणनीति बनाई इसी रणनीति के तहत आर्य कन्या दुर्गा ने भिन्न मोहक रूपों एवं अदाओं से महिषासुर जैसे प्रतापी राजा को अपनी रणनीति के तहत फँसाया और दिल जीतकर एवं इतिहासकार डी॰ डी॰ कौशम्बी के मतानुसार गवलियों (यादवों) के पुरूष देवता महिषासुर एवं खाद्य संकलन कर्ताओं की मातृ देवी (दुर्गा) का विवाह हो गया। गवलियों से आशय यादवों एवं अनार्यो से है। जबकि खाद्य संकलन कर्ता से आशय आर्यो से है। इतिहासकार भगवत शरण उपाध्याय ने कहा है कि हम ब्राह्मण (आर्य) भारत भूख से आहार की तलाश में चले थे इसी प्रक्रिया के तहत दुर्गा ने महिषासुर का विश्वास जीतकर महज दस दिनों में धोखे से मार ड़ाला। इस देश के मूल निवासी असुर यादव राजा के कुल खानदान, माता-पिता का नाम, ब्राह्मण एवं आर्य इतिहासकारों के ही मुताबिक ज्ञात है लेकिन आर्य इतिहास में दुर्गा की उत्पत्ति बड़ा दिलचस्प है। दुर्गा के माता-पिता, कुल-खानदान का कोई अता-पता नहीं है। दुर्गा को शिव, यमराज, विष्णु, इन्द्र, चन्द्रमा, वरूण, पृथ्वी, सूर्य, ब्रह्मा वसुओं कुबेर, प्रजापति, अग्नि, सन्ध्या, एवं वायु आदि के विभिन्न अंशों से उत्पन्न कर अन्यान्य देवताओ से अस्त्र-शस्त्र दिलवाया गया है। कोई धर्म भीरू अवैज्ञानिक सोंच का व्यक्ति ही इन बातों को स्वीकार कर सकता है। दुर्गा पूजा का जोरदार चलन कोलकाता एवं पश्चिम बंगाल में है। मै 1977 से 1982 तक कोलकाता में ही रहा और पढ़ा हूँ। मैने कोलकाता का दुर्गापूजा बारीकी से देखा है। कोलकाता में दुर्गा प्रतिमा बनाने वाले कारीगर वेश्यालय से थोड़ी मिट्टी जरूर लाते है। इस प्रक्रिया का सजीव चित्रण ”देवदास“ फिल्म में भी किया गया है। वेश्याऐं दुर्गा को अपनी कुल देवी मानती हैं। इसलिए दुर्गा प्रतिमा बनाने में वेश्यालयों से मिट्टी लाने का चलन है। असुर होने एवं आर्यो द्वारा इतिहास लिखने के बावजूद महिषासुर के कुल-खानदान का पता चलता है लेकिन आर्य पुत्री होने के बावजूद दुर्गा के कुल-खानदान का पता नहीं है। गुण एवं लक्षण के आधार पर मेरे जैसा दो-दो विषयों से परास्नातक शिक्षक महिषासुर को यादव मान रहा है तो निश्चय ही वेश्याओं द्वारा दुर्गा को कुल देवी मानने के पीछे एक बहुत बड़ा राज छिपा होगा जो सदियों से चला आ रहा है।
दुर्गा और महिषासुर की गाथा आर्यो द्वारा हजारों वर्ष पूर्व छल पूर्वक अपनी संस्कृति थोपकर हमें गुलाम बनाने की कहानी का एक हिस्सा है जिस पर पढ़े-लिखे पिछड़े एवं दलितों को व्यापक पैमाने पर शोध करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए तथा परम्परावादी बनकर सड़ी लाश को कंधे पर ढ़ोने की बजाय उसे दफन कर एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करनी चाहिए जो कमेरों की पक्षधर हो। मै अपने कुल श्रेष्ठ महाबली महिषासुर की स्मृतियों के समक्ष नतमस्तक हूँ तथा उन तमाम साथियों, पत्रिकाओं, संस्थाओं को धन्यवाद देता हूँ जो अपना इतिहास ढ़ूढने, लिखने एवं जानने की दिशा में आकुल-व्याकुल हैं। मै गाजियाबाद में फाइनआर्ट के डिग्री कालेज के शिक्षक श्री लाल रत्नाकर (यादव) को भी धन्यवाद देता हूँ जिन्होने महावीर महिषासुर का चित्र बनाया है जिसे फारवर्ड प्रेस ने अक्टूबर माह के अंक में छापा है।
 
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