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जिसमें स्वाभिमान नहीं वे मानसिक गुलाम हैं
हमारे समाज को मनुवादी व्यवस्था से ग्रसित लोग, आये दिन अपमान करते है, प्रताडि़त करते है। अगर हमारे समाज के लोगों में थोड़ा सा भी आत्म सम्मान है, तो उनको मंदिरों में जाना ही नहीं चाहिये। पूजा के स्थान बनाने के बाद उसम मनुवादी व्यवस्था को चलाने वाले ब्राम्हण मंदिरों में प्राण-प्रतिष्ठा का ढोंग और पाखण्ड करके मंदिर बनाने वाले लोगों का (एस.सी.,एस.टी.,ओबीसी) मंदिर प्रवेश वर्जित करते है, फिर कहते है कि गर्व से कहो कि हम हिन्दू है। दुनिया में जितने भी धर्म है वे अपने धर्म के लोगों के साथ भेदभाव व असमानता का व्यवहार नहीं करते है, बड़े दुःख की बात है कि दुनिया में अकेला हिन्दू धर्म ही ऐसा है कि जहाँ हिन्दू-हिन्दू के साथ भेदभाव, छुआछूत तथा असमानता का व्यवहार करता है। जो बराबरी का हक नहीं देता ऐसे धर्म को नहीं मानना चाहिये और न उसमें रहना चाहिए हमारे लोगों को स्वाभिमान चाहिए। जिसमें स्वाभिमान नहीं है वे मानसिक गुलाम है। उनको पता भी नहीं है कि वे लोग गुलामी में गर्व करते है।
तीर्थयात्राओं के मकड़जाल में फॅसा मेहनतकश बहुत ही सारगर्भित तथा मेहनतकश लोगों का आर्थिक, धार्मिक, शोषण करने के सारे बन्दोबस्त धर्म व धर्मशास्त्रों के मार्फत पुख्ता कर रखे है। मनुवादी व्यवस्था के पोषक (ब्राम्हण) लोगों ने लम्बे समय तक पीढ़ी दर पीढ़ी धार्मिकता कैसे कायम रहे इसके लिए देश के चारों दिशाओं से लेकर घर की चैखट तक मंदिरों का मकड़जाल मनुवादियों ने फैला रखा है। लोग हमारे है लेकिन उनके पास जो विचारधारा है वह विचारधारा हमारे महापुरूषों की नहीं है। हमारे लोगों के पास मनुवादी व्यवस्था को कायम रखने वाली विचारधारा है। क्रमिक असमानता की विचारधारा है। छुआछूत की विचारधारा है। जातिवाद की विचारधारा है। भेदभाव की विचारधारा है। ऊंच-नीच की विचारधारा है। अस्पृश्यता की विचारधारा है। उक्त ब्राम्हणी विचारधारा संविधान के अन्तर्गत असंवैधानिक विचारधारा है। संविधान के विपरीत विचारधारा आजाद भारत में 66 वर्ष से कायम है।
ब्राम्हण, मनुवाद व्यवस्था कायम रहे इसके पक्षधर है। लेकिन हमारे लोग जिनको ब्राम्हणी व्यवस्था से नुकसान तथा अपमानित होना पड़ता है वे इस व्यवस्था को कैसे ढो रहे है। यह समझ से परे है, जितने देश में शिक्षा के केन्द्र है उससे हजारों लाखों गुना घर गलियारे, चैराहे, तिराहे, सड़क किनारे सरकारी कार्यालय या कही खाली जगह जहाँ दिखी वहां कोई न कोई देवी-देवता का मन्दिर बना दिया जाता है। इस धार्मिक रूढ़िवादी तथा अंधविश्वास में हमारा पिछड़ा समाज दल-दल में फंसा हुआ है। तर्क-वितर्क, चिंतन तथा वैज्ञानिक सोच के आधार पर कोई इनसे यह प्रश्न नहीं पूछते कि,
1- इन तीर्थ यात्राओं का क्या औचित्य है,
2- आज के परिपेक्ष्य में क्या महत्व है।,
3- इन तीर्थ यात्राओं से लाभ किस संवर्ग को होता है,
4- क्या तीर्थ यात्रा करके कोई आईएएस,
5- या न्यायाधीश बना।
 
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