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मृत्युभोज
यो तो देश और समाज के अन्दर अनेकों प्रकार की कुरीतियां एवं पाखण्ड रूपी पौधे पूर्ण गति से फल फूल रहे हैं। उन कुरीतियों में मृत्युभोज एक बड़ी बीमारी बनके समाज को ग्रसित किए हुए है। दरअसल भारतीय समाज में ये मान्यताएँ हैं कि मृतक के शरीर को अग्नि को समर्पित (मुखाग्नि) करने वाले व्यक्ति का तभी उद्धार होगा, जब वह मृत्युभोज करें। एक जाति विशेष (ब्राम्हणों) को भरपूर दान दक्षिणा देकर भोजन कराये, जिससे कि मृतक की आत्मा को सुख-शान्ति के साथ स्वर्ग में वास करने के लिए स्थान आरक्षित होने की गारण्टी मिल जाती है।
दुर्भाग्य वश सदियों से देश में निरक्षरता का साम्राज्य रहा, जिसका फायदा उठाते हुए समाज के चन्द चालाक लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए पिछड़े और दलित लोगों को स्वर्ग-नर्क का भय दिखाकर अपने पाखण्ड रूपी जाल में फॅसाते रहे। परिणाम स्वरूप समाज का आर्थिक एवं सामाजिक भरपूर शोषण किया गया। लेकिन अब समाज पढ़-लिखकर जागरूकता आ जाने के कारण आम आदमी इन कुरीतियों एवं अंधविश्वास से निजात पाने के लिए बेचैन है।
मृत्युभोज पर होने वाले खर्च को एकत्र कर रचनात्मक कार्यो में लगाया जाय तो 10 वर्ष के अन्दर देश का चैमुखी विकास हो सकता है। औसतन देश में एक म्त्युभोज में लगभग-15-20 हजार का खर्च आता है, इस तरह देश में लगभग 33 लाख मृतकों का मृत्युभेाज करने में प्रतिवर्ष 49 अरब, 50 करोड़ रूपया मरने वालों की खुशी में हलुवा पू़री खिलाने में खर्च कर डालते हैं। जो कि असम, नागालैण्ड जैसे छोटे राज्यों के साल भर के बजट से भी ज्यादा है।
महाभारत युद्ध होने का था, अतः कृष्ण ने दुर्योधन के घर जा कर युद्ध न करने के लिए संधि करने का आग्रह किया, तो दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर कृष्ण को कष्ट हुआ, और वह चल पड़े, तो दुर्योधन द्वारा कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर कहा कि ’’सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’ हे दुयोंधन - जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो। तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।
इधर जब किसी नव जवान पुत्र की अर्थी उसके पिता के सामने उठ जाय उसकी नई नवेली दुल्हन की माँग का सिंदूर छूट भी न पाया हो उसके हाथो की मेंहदी अभी धूमिल भी न हुई हो, उस परिवार के लिए ऐसी घटना से बढ़कर दूसरा कोई कष्ट नहीं हो सकता। पहले कभी यही युवक अपनी नई नवेली दुल्हन को बैण्ड और शहनाई वादन के साथ इसी आॅगन में अपनी जीवन संगिनी बनाकर लाया था। आज उसी आँगन में उसकी ’’मौत का अंतिम जश्न’’ मनाने के लिए भोजन के भूखे भेडि़ये पंक्तिबद्ध बैठ चुके थे। भोज्य सामग्री भी परोसी जा चुकी थी। नियमानुसार दाग देने वाले बाप को पहले तीन कौर खाने को कहा गया। जैसे ही पिता पहला ग्रास मुँह में रखता है कि उसी समय मृतक की बहन अपने लाड़ले भाई के विछोह में, भैया-भैया कहते हुए घर में प्रवेश करते ही पछाड़ खाकर गिरती है। उसे देख बाप के मुँह से वह ग्रास पत्तल पर गिर जाता है तथा आँसुओं की धार से पत्तल भीग जाता है। वात्सल्य एवं ममता की प्रतिमूर्ति वह माँ , अपने कलेजे के टुकड़े के विछोह में सिर पटककर रो-रो कर मूक्र्षित हो जाती है। सप्ताह भर से हितैषियों द्वारा समझाने से बॅधा धैर्य का बाँध आज पुनः टूट जाता है। पूरे परिवार में करूण क्रन्दन से परिपूर्ण एवं हृदय विदारक वातावरण में भोजन के भूखे भेडि़ये अपनी उदरपूर्ति कर कृष्ण के उपर्युक्त कथन को कुचलते हुए भोज्य पदार्थो की तारीफ करते हुए कैसे चले जाते है यह मेरी समझ के परे है।
हिन्दू धर्म में मुख्य 16 संस्कार बनाए गए है, जिसमें प्रथम संस्कार गर्भाधान एवं अन्तिम तथा 16वाँ संस्कार अन्त्येष्टि है। इस प्रकार जब सत्रहवाँ संस्कार बनाया ही नहीं गया तो सत्रहवाँ संस्कार तेरहवीं संस्कार कहाँ से आ टपका। इससे सावित होता है कि तेरहवी संस्कार समाज के चन्द चालाक लोगों के दिमाँग की उपज है। यों तो मैने चारों वेदों एवं गीता, रामायण सहित हिन्दू धर्म के लगभग सभी धर्म ग्रन्थों का अध्ययन किया है। लेकिन किसी भी धर्म ग्रन्थ में मृत्युभोज का विधान नहीं है। बल्कि महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है। लेकिन जिसने जीवन पर्यन्त मृत्युभोज खाया हो, उसका तो ईश्वर ही मालिक है। इसी लिए महार्षि दयानन्द सरस्वती, पं0 श्रीराम शर्मा, स्वामी विवेकानन्द जैसे महान मनीषियों ने मृत्युभोज का जोरदार ढंग से विरोध किया है।
अन्त में मै सभी सम्मानित पाठकों से सादर आग्रह करूँगा कि जिस भोजन बनाने का कृत्य जैसे लकड़ी फाड़ी जाती तो रोकर, आटा गूँथा जाता तो रोकर एवं पूड़ी बनाई जाती है तो रोकर यानि हर कृत्य आँसुओं से भीगा। ऐसे आँसुओं से भीगे निकृष्ट भोजन एवं तेरहवीं भेाज का पूर्ण रूपेण बहिष्कार कर समाज को एक नई दिशा दें। जानवरों से सीख लेनी चाहिए, जिसका साथी विछुड़ जाने पर वह उस दिन चारा नहीं खाता है। जबकि 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव, जवान आदमी की मृत्यु पर हलुवा पूड़ी खाकर शोक मनाने का ढ़ोंग रचता है। इससे बढ़कर निन्दनीय कोई दूसरा कृत्य हो नहीं सकता।
मृत्युभोज न तो सामाजिक दृष्टि से, न धार्मिक दृष्टि से, न वैज्ञानिक दृष्टि से और न ही दिवंगत आत्मा की सुख शान्ति की दृष्टि से किसी व्यक्ति या समाज के लिए उपयोगी नहीं सिद्ध हो सकता है। हाँ, उन 13 लोगों के लिए मृत्यभोज फलीभूत अवश्य होता है जिन्हें मुफ्त में खाने के अलावा कपड़े, बर्तन, एवं नगद धनराशि की प्राप्ति होती है। इस लिए वह ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि नित्य ही ऐसी जुगाड़ बनती रहे। उन्ही को सादर समर्पित है ये पंक्तियाँ :--

आए खाने तेरहवी पंडित जी हर्षाय।
नहीं अकेले संग में बारह और लिवाय।।
बारह और लिवाय पूडि़याँ ढँ से धमकी।
उन्हें नही परवाह कछू उस घर के गम की।।
दान दक्षिणा पाकर पंडि़त फूले नही समाए।
कहते हुए गए कि भगवन रोज यही दिन आये।।
भारतीय समुझाय सुनो हे अंध्विश्वासी भैया।
दल्लालों के कहने पर क्यों खर्चा करत रूपैयां।।

 
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