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बलात्कार की जडें हिन्दू संस्कृति में
निश्चित तौर पर जिस युवती ने अपने मासिक धर्म के बाद वस्त्र बदल लिए है वह पवित्र है। अतः जब युवती अपने मासिक धर्म के बाद वस्त्र बदल ले तब उस उत्कृष्ट महिला को सहवास के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। अगर वह राजी न हो तो उसे प्रलोभन दो। अगर वह फिर भी न माने तो लाठी से उसकी पिटाई लगाओं या उसे घूसे मारो और यह कहते हुए उसे काबू में कर लो कि मैं अपने पौरूष और तेज से तुम्हारी सुषमा ले रहा हॅू। (बृहदारण्यकपनिषद्-6.4.9.21)
इस बार भी स्वतः स्फूर्त भीड़ इकट्ठी हुई कि बलात्कार पीडि़त को न्याय मिलना चाहिए। हाँ, बिल्कुल मिलना चाहिए। किन्तु केवल इसी को क्यों, बाकी को क्यों नहीं? साम्प्रदायिक दंगों में जिन महिलाओं के पेट में तलवार भोंकी गयी है वे आज भी न्याय के लिए प्रतीक्षा कर रही है। जाति के आधार पर अत्याचार-खैरलाँजी, महाराष्ट्र (2006)से लेकर हाल में हरियाणा के बलात्कार की लम्बी श्रृंखला - क्या बलात्कार की परिभाषा में नहीं आते?
जब भॅवरी देवी के मसले पर माननीय न्यायालय ने न्याय सुनाया था कि कोई अपर कास्ट पुरूष लोअर कास्ट की महिला से रेप नहीं कर सकता और अभियुक्तों को बरी घोषित किया था तो अपर कास्ट की महिलाओं ने अभियुक्तों की जीत के पक्ष में जुलूस निकाले थे। शर्म है ऐसे माननीय न्यायाधीश पर।
मीडिया ने दिल्ली गैंगरेप को जोर-शोर से उठाया। क्योंकि लड़की को बताया गया कि वह ओबीसी, कुर्मी जाति समुदाय की है। (द हिन्दू समाचार पत्र, 20 दिसम्बर, 2012) लड़की की मौत के बाद उसके पिता ने उजागर किया कि लड़की का नाम निर्भया पाण्डे है। क्या कारण था कि मीडिया ने बलात्कार पीडि़त की जाति की पड़ताल नहीं करवाई? क्या जाति भारत की एक अकाट्य सच्चाई नहीं है ?
मुद्दा सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता में परिवर्तन करने का है। कोई एक नियम, कानून या सजा रेप को दूर नहीं कर सकता, वह चाहे फाँसी की सजा हो या केमिकल कस्ट्रेशन। यदि कोई ऐसा कह रहा है तो वह सामाजिक सच्चाई की कटुता से परिचित नहीं है या जानबूझ कर ध्यान भटकाना चाहता है। मामला कहीं अधिक गहरा है। महिला अत्याचार और जुल्म सामाजिक व्यवस्था के केन्द्र में बसा हुआ है और उसे शक्ति मिल रही है धर्म, संस्कृति और परम्पराओं से। उस शक्ति संरचना और उसे पोषित करने वाले धर्म संस्कृति पर चोट क्यों नहीं? हिन्दू पुराणों और अन्य ग्रंथो के अनुसार ब्रम्हा ने अपनी बेटी के साथ रेप किया और उसे अपनी पत्नी बनाया उसको अपराधी घोषित नहीं किया गया। विष्णु ने अनुसूया और शिव ने मोहिनी के साथ रेप किया। इनको अपराधी घोषित नहीं किया गया, बल्कि देवता घोषित किया गया। इन्हें देवता इसलिए बनाया गया कि पितृसत्ता और बलात्कारी मानसिकता को कोई चुनौती नहीं दे सके। मनुष्य के खिलाफ तो कोई बोल सकता है, देवताओं पर प्रश्न उठाना तो अधर्म है। आखिर उस पर चुप्पी कैसी?
महिलाओं को दोयम दर्जे का मनुष्य, मनुस्मृति से लेकर रामचरित्रमानस तक में बताया गया। तो सभी मूल, धारणाऍ और परम्पराएं ठुकराई जानी चाहिए जो पुरूष की तुलना में महिला को दोयम दर्जे का बनाते हैं। धर्मराज और सत्यवादी कहे जाने वाले युधिष्ठिर के लिए द्रोपदी तो वस्तु है। जिसे उन्होंने जुए में लगा दिया। सीता को आदर्श महिला मात्र इसलिए माना जाता है, क्योंकि वह पुरूषों की, राम और लक्ष्मण की कथित तौर पर आज्ञाकारी थी। क्या आज्ञाकारी होना ही आदर्श महिला का गुण है? उसके सामने दोनों ने अकेली निर्दोष सुपर्णनखा के नाक, कान काटा, उसने क्यों नहीं रोका। नाक, कान कटवा कर सूपर्णनखा न्याय के लिए भटक रही है। इन सभी मूल्यों को ठुकराए बिना महिलाओं के पक्ष में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं है।
पितृसत्तात्मक और जातिगत शोषणकारी और भेदभावकारी धार्मिक स्वरूप पग-पग पर सामने आता है। फूलन देवी जिसके साथ अपर कास्ट के 15 लोगों ने गैंगरेप किया। परन्तु उसने पलटवार किया, वह एक बहादुर महिला थी, क्यों मुँह मोड़ा जाता है फूलन देवी के नाम से? भारतीय महिलावादी आन्दोलन सीमोन द बोउवार, केथ मिलेट और लुड़ विग फायरएस्टोन का नाम तो ले लेते हैं किन्तु फूलन देवी का क्यों नहीं? वह भी तब जब पिछले दिनों प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने फूलन देवी को विश्व स्तर की विद्रोही महिला का दर्जा दिया है?
दिल्ली सामूहिक बलात्कार काण्ड के विरोध में अरविन्द केजरीवाल व कुछ अन्य सिविल सोसायटियों ने 03 जनवरी को काला दिवस घोषित किया और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सभा आयोजित की। 03 जनवरी, 2013 को आरोपितों की कोर्ट में पहली पेशी थी। वह दिन तो स्वागत योग्य है ताकि न्यायिक प्रणाली अपना काम करे और अपराधियों को सजा मिल सके। आखिर यह काला दिवस कैसे हो गया? अगर काला दिवस मनाना ही था तो 16 दिसम्बर को काला दिवस घोषित किया जाना चाहिए था, जिस रात को सामूहिक बलात्कार की जघन्य घटना हुई थी। वास्तव में इस घोषणा के पीछे एक काला एजेण्डा छुपा था। वह एजेडा था- बहुजन समाज के गौरवपूर्ण दिवस को काला दिवस में बदलना। याद रहे कि 03 जनवरी को देश की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्मदिवस है। इस दिन को भारत के कई समुदाय के लोग प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं।
बहरहाल, दलित युवा लेखिका अनिता भारती ने 03 जनवरी को जंतर-मंतर पर ही एक सभा का आयोजन कर काला दिवस घोषित किए जाने का पुरजोर विरोध कर इस साजिश को विफल कर दिया।
भारतीय न्याय प्रणाली के बारे में बताया जाए कि पवित्र मानी जाने वाली संस्था सर्वाधिक अलोकतांत्रिक है। यह एक ऐसी संस्था है, जिसमें वंचित वर्गो का प्रतिनिधित्व नही कें बराबर है। न्यायपालिका में न्याय की कुर्सी पर बैठे न्यायाधीश अपर कास्ट के पुरूष तो हैं ही, वे धनी वर्ग से भी है, जो पितृसत्ता व जातिवादी मानसिकता से परिपूर्ण है। कई निर्णयों में ऐसा स्पष्ट हो चुका है। न्यायपालिका ‘न्याय‘ नहीं सुनती बल्कि निर्णय सुनाती है। यह मात्र संयोग नहीं कि जेल में बन्द अधिकांश अभियुक्त दलित, पिछड़े और अल्पंख्यक समुदाय से आते है। बिहार के जेल में बन्द मौत की सजा पाए 36 में से 35 लोग दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग से आते है। (देखे प्रभात कुमार शांडिल्य का सर्वे आधारित लेख,’हंस’) भारत सरकार में सचिव के पदों पर बैठे सभी लोग ’अपर कास्ट’ के है, और जेल में बन्द अभियुक्त वंचित समाज के?अपराध के कारणों की व्याख्या नए सिरे से करने की जरूरत है। विवेचना करने की जरूरत है कि समाज के कमजोर तबकों की महिलाओं के साथ बलात्कार करने वालों के खिलाफ प्रदर्शन क्यों नहीं होते? इन अपराधियों को सजा क्यों नहीं मिलती, और कौन से कारण जिम्मेदार है इसके लिए।
बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा की माँग करने के बदले समाज को अपनी आत्मा को खँगालने की जरूरत है कि हमारे समाज को रूग्न करने वाली जड़ें कहाँ है। उसे यह भी देखना होगा कि हमारी महिलाओं और लड़कियों से कैसा सलूक किया जाता है, हमें समस्या की जड़ तक पहुँचना होगा, अन्यथा आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती।
 
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