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सामाजिक क्रान्ति क्यों नहीं ?
जब-जब जनवादी समुदाय अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुआ उनमें मानवीय अधिकारों के प्रति चेतना आई उनका आक्रोश फूटा तब-तब उन देशों में जनक्रान्तियाँ हुई है।
इसी तरह की एक क्रान्ति अफ्रीका में नब्बे के दशक में हुई। जब श्वेतों को अपनी सत्ता छोडनी पडी और अफ्रीकन नीग्रो नेता नेल्सन मंडेला को सत्ता सौंपी। आज अश्वेत वहाँ सत्ता पर काबिज है।
भारत में भी कई बार क्रान्तियों का दौर आया था, लेकिन उनके विरूद्ध प्रतिक्रान्तियां होती रही और उन जन क्रान्तियों के आन्दोलन को दबा दिया गया। ये क्रान्तियां रामायण कालीन शम्बूक के समय हुई, कृष्ण के समय एकलब्य के द्वारा एक क्रान्ति का सूत्रपात हो जाता अगर गुरूदक्षिणा में गुरू द्रोणाचार्य ने एकलब्य से उसका अंगूठा मांग न लिया होता, तथागत गौतम बुद्ध के समय, महाबीर के समय और आधुंनिक युग में बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर के द्वारा भी एक क्रान्ति हो सकती थी। लेकिन यहाँ यथास्थितिवादी लोगों ने प्रतिक्रान्तियाँ कर उन आन्दोलन को अपनी मनुवादी नीतियों के चलते दबा दिया।
बाबा साहब डा0बी0आर0 अम्बेडकर जो इस देश में क्रान्ति का बीजारोपण करना चाहते थे, उनको यह बात बहुत परेशान कर रही थी कि आखिर इस देश में अब तक सामाजिक क्रान्ति क्यों नहीं हुई? क्रान्तियां हुई है।पुष्यमित्र संुग के काल में एक धार्मिक क्रान्ति हुई थी। चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य के काल मे राजनैतिक क्रान्ति हुई थी। आज आधुनिक भारत में तो कई क्रान्तियां होती दिखाई दे रही है। परंतु सामाजिक क्रान्ति तो इस देश में हो ही नहीं रही है। ये एक विचारणीय एवं ज्वलन्त प्रश्न हम भारतीयों के सामने ज्यों का त्यों खड़ा है। लगता है कि उस क्रान्ति में सबसे बड़ा अवरोध है- भारत में प्रस्थापित वर्ण पर आधारित जाति व्यवस्था।
आज भारतीय समाज हजारों-हजारों जातियों में बँटा पड़ा है। एक ही जाति में कई-कई उपजातियाँ हैं। ब्राम्हण सबसे ऊँचा, उससे नीचा क्षत्रिय, क्षत्रिय से नीचा वैश्य और सबसे नीचे शूद्र और अतिशूद्र वर्ग। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक भारतीय कौम कहलाने के बावजूद इनका आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध भी नहीं है। हमारी इसी कमजोरी का लाभ उठाकर शक, हूण, यवन, मुगल और अंग्रेज जो कि मात्र व्यापार के उद्देश्य से भारत आये थे हम पर 200 वर्ष राज कर गये। अगर हमारा एक जातीय समाज होता तो हमारी एकता सुदृढ़ होती तो हम पर ये विदेशी राज कर ही नहीं सकते थे।
यहाँ प्रथम मुगल सम्राट बाबर के समय की ऐतिहासिक घटना का जिक्र दृष्टव्य है-जब बाबर अपने कुछ सैनिकों के साथ हिम्मत पस्त होकर वापस अपने देश को लौटने को सोच ही रहा था कि उस रात सामने अपने विरोधियों ’भारतीयों’ के शिविरों में अलग-अलग जगहों से अलग-अलग धुँआ उठते हुये देखा तो उसने अपने सैनिकों से पूछा कि ये शत्रु शिविर में इस तरह से अलग-अलग जगहों से धुआं क्यों उठ रहा है? मुगल सैनिकों ने बाबर को बताया कि ये लोग अपने-अपने शिविरों में अपना-अपना खाना बना रहें है। तब बाबर के मन मस्तिष्क में ये विचार उठा कि जो लोग एक साथ बैठकर खाना नहीं खा सकते तो एक साथ लड़ेगें क्या? और बाबर ने अपने सैनिकांें को सावधान किया और रात में ही अपने शत्रुओं के खेमों पर हमला बोल दिया। आखिर बाबर को तो विजयी होना ही था। उसके बाद बाबर का बार-बार हौसला बढता ही रहा उसे हिन्दू समाज में व्याप्त जातीय विभेद के कारण आशातीत सफलता मिलती गयी। उसने भारत में मुगलिया सल्तनत की नींव डाल दी और उसके बाद इतिहास हमारे सामने है। मुगल 500 वर्ष हमारे देश पर राज कर यहीं बस गये।
यह एक एतिहासिक सत्य है कि हमारी इस जाति भेद और सामाजिक विघटन व्यवस्था के कारण एक नहीं कई विदेशी जातियाँ हम पर राज कर गई। इस तथ्य को हमारे इतिहासकारों ने स्वीकारा है। लेकिन हम भारतीयों ने विदेशियों की गुलामी और इतिहास से सबक नहीं लिया। आज हम भी जातिवाद से अपना मोह नहीं त्याग रहें है। अगर हमने ये जातीय मानसिकता नहीं छोडी तो भारत का शोषित पिछड़ा दलित तबका एक दिन उठ खड़ा होगा और देश में एक सामाजिक क्रान्ति हो जायेगी। जिसे रोक पाना सम्भव नहीं होगा इससे देश में एक संकट पैदा हो सकता है।
26 जनवरी 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ था तो संविधान निर्माता बाबा साहब डा0 अम्बेडकर ने अपनी चिन्ता को एक चेतावनी के रूप में इन शब्दों में व्यक्त किया था।
26 जनवरी 1950 से हम अंतर्विरोधों की जिन्दगी शुरू करने जा रहे है। राजनीति में हमारे पास समानता होगी। जबकि सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में हम असमान होंगे। राजनीति में हम एक आदमी एक वोट का एक मूल्य का सिद्धान्त मानेगें जब कि हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में अपने सामाजिक आर्थिक ढॉचे के कारण हम एक आदमी के एक मूल्य के सिद्धान्त से इनकार करेंगे। आखिर कितने समय तक हम ऐसे अन्तर्विरोध का जीवन जीयेंगे और कितने समय तक हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता से इन्कार करते रहेंगे। अगर अधिक दिनों तक इन्कार करते रहे तो हम अपने राजनैतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल देगें। हमको ये अन्र्तविरोध कम से कम समय में समाप्त करने होंगे। यदि नहीं तो जो लोग असमानता से कष्ट भोगेंगे वे हमारे राजनैतिक लोकतन्त्र के ढाँचे को चकनाचूर कर देंगे। वास्तव में बाबा साहब की अपने देश व लोकतंत्र के प्रति ये चिन्ता शत-प्रतिशत सही प्रतीत होती है। अगर हम भारतीय बाबा साहब की उस चिन्ता और चेतावनी को नहीं समझ पाये और सामाजिक विषमता को समाप्त नहीं किया तो देश में सामाजिक क्रान्ति की गति तेज होने की प्रबल सम्भावनायें बन जायेगी।
भारत में बाबा साहब के विचारों से अभिप्रेरित दलित समाज जो जातिवाद के इस कोढ से सर्वाधिक पीडि़त हैं, उसमें जागृति आ रही है अब वे इस कोढ़ से मुक्त होना चाह रहे है। पूर्व प्रधान मंत्री वी0पी0सिंह के समय में मण्डल आयोग की रिपोर्ट का लागू होना, दलितों के साथ-साथ पिछड़ों को भी आरक्षण का लाभ मिलने से इन पिछड़ी जातियों तथाकथित शूद्र जातियों का लामबन्द होना आरम्भ हो गया। यही कारण था कि दलित और पिछडों में शोषण के खिलाफ और अपने अधिकारों की प्रति चेतना का प्रस्फुटन हुआ है। वे उस तरफ अपने कदम बढा भी रहे हैं। उन्हें सफलता भी मिल रही है। दलित नेत्री मायावती का उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ राज्य की चार बार मुख्य मंत्री बनना, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव व उनकी पत्नी राबड़ी देवी का मुख्य मंत्री बनना अजीत जोगी, शीबू सोरेन, अर्जुनमुण्डा आदि का शासन सत्ता सँभालना ये एक राजनैतिक सामाजिक क्रान्ति की शुरूआत हो चुकी है। लेकिन जो यथा स्थितिवादी तत्व है, मनुवादी सोच के लोग हैं वे नहीं चाहते कि ये दलित पिछड़े एक हों, यही कारण था कि इन तत्वों ने इन्हें तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बाबा साहब के क्रान्तिकारी दर्शन से प्रेरित, सामाजिक क्रान्ति की ओर बढ़ रहे इन शोषितों के पिछड़ों के बीच अपनी कूटनीति से एक दरार डाल दी। इन्होने अपनी रीति-नीति से इन पिछड़ों के बीच विवाद के बीज बो दिये हैं।
हम देखते हैं कि किस तरह से कांशीराम-मुलायम सिंह यादव शासन सत्ता करने के उद्देश्य से एक हुये थे तो मायावती के आते ही भाजपा जैसी पार्टी ने बीच में ही इन पिछड़े नेताओं को भ्रमित कर उस सामाजिक एकता को तोड़ा और देश में एक सामाजिक क्रान्ति की ओर बढ़ते कदमों को रोक दिया गया। आज दलित पिछडों के नेता लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती, रामविलास पासवान एक दूसरे के खिलाफ खड़़े है। इस तरह से बहुजन समाज शूद्रों-अतिशूद्रों को एक होने से किस तरह से रोक दिया गया। इसके लिये हमारे तथा कथित राजनेता भी काफी हद तक जिम्मेदार है। आज बसपा जिसे हम बाबा साहब के सोच पर आधारित दलितों की राजनैतिक पार्टी मानते थे वह आज हाथी नहीं गणेश है, ब्रम्हा-विष्णु-महेश है’ का नारा दे रही है। ये पार्टी कल तक जो बहुजनों की पार्टी की बात कर रही थी, वही आज सर्वजन पार्टी का राग अलाप कर रही है।
इससे हमारे देश में जो एक सामाजिक क्रान्ति की सम्भावना बन रही थी, उसका मार्ग अवरूद्ध कर दिया गया और तो और ये यथास्थितिवादी तत्व दलितों और पिछड़ो के आरक्षण को भी भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण के नाम पर एक सोची समझी चाल के तहत योजनाबद्ध तरीके से आरक्षण को समाप्त करने में लगे हुये है। ऊपर से धार्मिक उन्माद का जैसे दौर शुरू हो गया है एक वैज्ञानिक नये सोच की जगह वेद पुराणों का पाठन, यज्ञोपवीत प्रशिक्षण शिविर, दूरदर्शन पर देवी-देवताओं की गाथाएं, उनका प्रचार-प्रसार बडे़ ही जोर शोर से चल रहा है। ऐसे में भारत में सामाजिक क्रान्ति की सभी सम्भावनायें शिथिल पड़ती नजर आ रही है। तो भला अब सामाजिक क्रान्ति कैसे सम्भव होगी? कैसे इन दलितों व पिछड़ों को न्याय मिलेगा? इस प्रश्न ने उस समय बाबा साहब डा0 अम्बेडकर को परेशान किया था। आज जो देश में सामाजिक समानता, देश की एकता व अखण्डता के बारे में जो गम्भीर रूप से सोचते हैं, उन समाज अध्येता समाजवादी चिंतकों को भी आज के प्रश्न परेशान कर रहे हैं।
अगर इस देश में सामाजिक क्रान्ति नहीं हुई और पिछड़े तबकों को देश की धन धरती में समान रूप से हिस्सेदारी नहीं मिली तो सामाजिक न्याय तो जैसे एक दिवास्वप्न ही बन कर रह जायेगा। किसी महापुरूष ने सही कहा है, ’’उठो और आज से ही कार्य आरम्भ कर दो, ये समझ लो कि क्रान्ति तुम्हारे से ही शुरू होगी।‘‘
 
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