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सम्पादकीय
यदि पिछड़े दलित समाज की दुर्गति का कारण जानना है तो समाज का ‘पोस्टमार्टम’ उसी प्रकार करना होगा जिस प्रकार किसी मृतक के मौत का कारण जानने के लिए चीर-फाड़ कर पोस्टमार्टम किया जाता है। जिस प्रकार बाघ के जाल को बाघ नहीं समझता, चूहे के जाल को चूहा नहीं समझता और फंसता चला जाता है। उसी प्रकार ब्राह्मण के जाल को साधारण बुद्धि वाले पिछड़े वर्ग के लोग समझ नहीं पा रहे हैं और ब्राह्मण के गुलामी में फंसता चला आ रहा है। बैक्टीरिया साधारण आँख से दिखाई नहीं देता उसके लिए माइक्रोस्कोप की जरूरत होती है उसी प्रकार ब्राह्मण की गुलामी साधारण बुद्धि से दिखाई नहीं देती है उसके लिए तीक्ष्ण/तर्कशील बुद्धि की जरूरत होती है। स्वयं चिन्तन करें- पढ़े लिखे सम्पन्न बुजुर्ग यादव, मौर्य, लोधी अथवा अन्य पिछड़े वर्ग के अधिकारी को कम उम्र का भिखमंगा अनपढ़ ब्राह्मण आर्शीवाद देता है क्या यही स्वाभिमान है ?
लड़का लड़की का पालन पोषण व शादी विवाह की तैयारी उसके माता पिता करते हैं लेकिन शादी करवायेगा ब्राह्मण। पिछड़े वर्ग के लोग घर-मकान स्वयं बनायेंगे, गृह प्रवेश करवायेगा ब्राह्मण, मूर्ति बनायेगा कलाकार प्राण प्रतिष्ठा करवायेगा ब्राह्मण। देवी हो या देवता मंत्र पढ़ेगा संस्कृत में ब्राह्मण, क्या देवी देवता केवल संस्कृत भाषा ही जानते हैं ? क्या वे अंग्रेजी हिन्दी नहीं समझते। अच्छे ढ़ंग से नहाये धोये को भी दो बूँद जल छिड़क कर पवित्र करेगा ब्राह्मण। कोई एम.बी.बी.एस. करने पर ही डाक्टर कहलायेगा लेकिन ब्राह्मण का बच्चा जन्मते ही पंडित (निपुण) कहलाता है। विष पैदा करता है सांप और विषमता (ऊँच-नीच, छुआ छूत) पैदा करता है ब्राह्मण। जिला का मालिक डी.एम. राज्य का मालिक सी.एम. देश का मालिक पी.एम. लेकिन हिन्दू धर्म का मालिक ब्राह्मण, क्या शेष सभी हिन्दू नालायक (मालिक होने लायक नहीं) हैं।
इस प्रकार क्या हिन्दू धर्म एक जेल नहीं है ? क्या ब्राह्मण जाति उस जेल का जेलर नहीं है और क्या सभी जातियाँ कैदी नहीं है ? क्या रामचरित मानस, गीता, महाभारत, पुराण मनुस्मृति जेल मैनुअल नहीं है? जिसमें केवल जाति के नाम पर ब्राह्मण को प्रतिष्ठा ही प्रतिष्ठा और सभी जातियों को कैदी की तरह अपमान ही अपमान लिखा है। जेल में कैदी घुसते ही जेल के अधीन हो जाते हैं और हिन्दू जन्मते ही ब्राह्मण के अधीन हो जाते हैं। जेल केवल कैदी को कंट्रोल करने के लिए है, यहाँ न सजा सुनायी जाती है और न ही रिहाई। उसी प्रकार हिन्दू धर्म, हिन्दू को कंट्रोल करने के लिए है यहाँ ब्राह्मण न मुक्ति दिला सकता है और न सजा।
हिन्दू शब्द वेद, पुराण, उपनिषद रामायण महाभारत गीता यहाँ तक कि अकबर के समय (सन् 1700 ई0) में तुलसीदास द्वारा लिखा गया रामचरित मानस में भी नहीं है। भारतीय संविधान में भी यह (हिन्दू) शब्द नहीं है। इसमें इण्डिया और भारत ही लिखा गया, हिन्दुस्तान नहीं।
इतिहास साक्षी है कि विदेशी अंग्रेज भारत आया शासन किया लेकिन किसी हिन्दू को नमस्ते नहीं किया। उसके पहले विदेशी मुगल आया शासन किया लेकिन किसी को नमस्ते नहीं किया। उससे भी पहले विदेशी आर्य ब्राह्मण आया समाज में शासन किया और आज भी कर रहा है लेकिन किसी यादव, कुर्मी, मौर्य लोधी आदि को नमस्ते नहीं कर रहा है। ब्राह्मण हिन्दू नहीं हिन्दू के बाप का बाप यानी बाबा है इसीलिए सभी हिन्दू से अपना पैर छुआता है।
इस प्रकार किसी हिन्दू को स्वाभिमान नहीं है, वह इन्सान है ही नहीं बल्कि ब्राह्मण का गूंगा गुलाम है और गुलामी पर ही गर्व करता है। फूट डालो और शासन करो, के तहत धर्म के नाम पर वर्ण जाति का जहर और विषमता का विष पैदा कर सभी हिन्दू को मानसिक गुलाम बना दिया है।
डाक्टर एक नस बन्द करता है तो जिन्दगी भर बच्चा होना बन्द हो जाता है और ब्राह्मण षड़यंत्र के तहत धर्म के नाम पर हिन्दू का सात नस बन्द कर देता है तो उसके सात पीढ़ी में भी कभी किसी को बुद्धि नहीं आयेगी। जिसके पास बुद्धि और सम्मान वही सर्व शक्तिमान। गुलामी की क्या पहचान साफ शरीर पर सात निशान।
1- टीक
2-टीका,
3- तगमा,
4-जनेऊ,
5- जन्तर,
6- कंगन,
7- अंगूठियां। बर्तन साफ करते समय कहीं जूठन नहीं छोड़ते, कपड़ा साफ करते समय कहीं गन्दा नहीं छोड़ते तो खोपड़ी साफ करते समय थोडा सा टीक (चोटिया) क्यों छोड़ते हैं ? क्या यह बुद्धिमानी है या ब्राह्मण की गुलामी ? क्या यह गुलामी मापने का मीटर नहीं है ? अंग्रेजी में इसे च्पह.जंपस (सुअर-पूँछ) कहा गया है। डिक्शनरी देख सकते है।
ब्राह्मण माथे पर टीका (तिलक) लगाने के बहाने सबका माथा छूता है और सभी से अपना गन्दा पैर छुआता है। क्या यह समता है या घोर विषमता? पालतू कुत्ता और स्वतंत्र कुत्ता में क्या फर्क है ? पालतू कुत्ते के गले में बेल्ट होता है उसी प्रकार षड़यंत्र (धर्म) के तहत दलितों-पिछड़ों के हाँथ या गले में तमगा (कंठी) गुरू द्वारा बांध दी जाती है। जो गुलामी की निशानी है।
सरकश (मरकहे)बैल को नाथ डालना उसकी शोभा के लिए है या लगाम के लिए, यादव, भूमिहार, कुर्मी को जनेऊ उसके शोभा के लिए है या लगाम के लिए ? अगर जनेऊ हिन्दू के लिए है तो डोम, चमार, पासी या अन्य हिन्दू को क्यों नहीं पहनाया जाता ?अगर कान पर रखने से फायदा है तो दोनों कान पर रखकर दुगना फायदा क्यों नहीं लेता ? महिलायें तो अधिक धार्मिक हैं उन्हें जनेऊ क्यों नहीं पहनाते ?
जो आदत, भाषा, शब्द बचपन में सिखाया जाता है वही बाद में आदत बन जाता है। इसीलिए षडयंत्र के तहत गण्डा, जन्तर बचपन में ही बांध दिया जाता है ताकि जवानी से बुढ़़ापे तक मानसिक गुलाम बना रहे। कलाई किसी भी जाति का हो बांधने वाला है पंडा, तो कंगन (रक्षासूत्र, कलावा) हो गया पंडा का झंडा और बंधवाने वाला हो गया चलता फिरता मजबूत डंडा और फहराता है दिन-रात पंडा का झंडा। क्या यह बुद्धिमानी है या ब्राह्मण की गुलामी ? कैदी की पहचान हथकड़ी है तो गुलामी की पहचान रक्षा सूत्र है। जब कोई गुनाह करता है तब ही हथकड़ी लगाई जाती है जब कोई पूजापाठ करता है तब ही रक्षाबन्धन (हथकड़ी) लगाया जाता है। गुनाह कोई सा भी हथकड़ी एक ही है। पूजा पाठ किसी भी देवता का हो रस्सी धागा एक ही है।
बीस साल की बहादुर बहन पाँच साल के दुर्बल छोटे भाई को रक्षासूत्र बांधकर किस प्रकार के रक्षा की उम्मीद कर सकती है षड़यंत्र है कि नारियों को नीचा रखा जाय।
दाहिने हाँथ के अँगूठी में दाल, दूध, घी का चिकनापन रह सकता है बाये हाँथ की अंगूठी में गंदगी (पाखाना) का अंश भी रह सकता है तो अंगूठियों में बैक्टीरिया बनेगा या एंटीबायटिक मलहम ? घोडे की नाल जो जानवर के पैर में होता है उसे लोग गर्व से हाँथ में पहनते हैं और उसी हाँथ से खाना खाते हैं तो ऐसे लोगों का दिमाग जानवर घोडा से बेहतर होगा या बदतर।
कहावत है कि लड़का पढ़ता है तो एक पढ़ता है यदि एक लड़की पढ़ती है तो एक परिवार पढ़ता है क्योकि पढ़ी महिला अपने बच्चों को पढ़ा ही देगी। इस सूत्र (फार्मूला) को पाखडियों ने सैकड़ो साल पहले लागू किया कि लिखी मर्द को बेवकूफ बनावेगा तो एक को बेवकूफ बनावेगा और अगर एक महिला को बेवकूफ बना देता है तो एक परिवार को बेवकूफ बनाने में सफल होता है। यही कारण है कि हिन्दू के जितने भी व्रत त्यौहार हैं सब महिलाओं के जिम्मे दे दिया। इसी कारण आज भी कथा भागवत व यज्ञ की कलश यात्रा में महिलाओं को बुलाया जाता है।
दरअसल आर्य संस्कृति पुरूष प्रधान संस्कृति है और इसमें किसी न किसी बहाने महिलाओं को अधिकतर त्यौहार के नाम पर उपवास कराया जाता है। इस प्रकार धर्म के नाम पर हिन्दू समुदाय को पूरे नस्ल का बरबाद करने का षड़यंत्र हैै। एक गर्भवती महिला को जिसे डबल भोजन की जरूरत है उसे सिंगल भोजन भी मना कर दिया जाता है तो वह महिला कितना स्वस्थ बच्चा पैदा कर सकती है ? इसके विपरीत सिक्ख समुदाय की महिलायें कभी उपवास नहीं करती इससे स्वस्थ सरदार पैदा करती हैं। क्या व्रत त्यौहार वन वे ट्रैफिक हैं जो नारी पुरूष के लिए कर सकती है पुरूष नारी के लिए नहीं। उपरोक्त बिन्दुओं पर आज चिन्तन और मनन की आवश्यकता है।
 
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